मनोज सिन्हा : संघर्षों के शिल्पकार, सपनों के वास्तुकार"
🔹संघर्ष से सेवा तक की एक प्रेरणास्पद जीवनगाथा।
🔹जन्मदिवस पर बेटे ऋतुराज ने भावपूर्ण कविता के ज़रिए किया पितृ श्रद्धा का उज्ज्वल आलोक।
✍️ एक रिपोर्ट: राजीव रंजन
जमुई/बिहार : कभी बिहार के नवादा और अकबरपुर की पगडंडियों पर शिक्षा की खोज में भटकता एक बालक — आज जमुई जिले के शिक्षा-परिदृश्य को दिशा देने वाला एक प्रेरणास्तंभ बन चुका है। श्री मनोज कुमार सिन्हा, जिनके नाम के साथ अब "संघर्षशील शिक्षाविद्" और "समाज निर्माता" जैसे विशेषण स्वाभाविक हो चले हैं, आज अपना 64वां जन्मदिन मना रहे हैं।
इस विशेष अवसर पर उनके सुपुत्र ऋतुराज सिन्हा ने उन्हें समर्पित एक अत्यंत भावप्रवण कविता "एक युगपुरुष की कहानी – जन्मदिन की जुबानी" के माध्यम से उनके जीवन के तमाम संघर्षों, त्याग, और आदर्शों को शब्दों में ढाला। यह कविता न केवल एक बेटे की श्रद्धा है, बल्कि उस पीढ़ी की कृतज्ञता भी, जो उनके द्वारा दिखाए गए मार्ग पर चलकर आगे बढ़ रही है।
मूल्य आधारित जीवन की नींव: परिवार से समाज तक:
मनोज सिन्हा का जन्म 5 अगस्त 1961 को बिहार के पचरुखी गांव में हुआ। पिता स्व. सुरेश प्रसाद सिन्हा और माता शारदा देवी के स्नेह से पले-बढ़े, मनोज जी ने बहुत ही कम उम्र में जीवन के कठिनतम मोड़ों का सामना किया। मात्र 21 वर्ष की आयु में माँ का निधन, और 28 वर्ष में पिता का वियोग — दो सबसे बड़े संबलों को खो देने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी।
परिवार में सबसे बड़े होने के नाते उन्होंने न केवल सात भाई-बहनों को एकजुट रखा, बल्कि उन्हें सम्मानपूर्ण जीवन देने का भी संकल्प निभाया। इसी दौरान वर्ष 1983 में कुसुम सिन्हा के साथ विवाह हुआ — जिन्होंने हर मोड़ पर उनकी जीवन संगिनी ही नहीं, बल्कि एक मजबूत सहचरी के रूप में साथ निभाया।
संघर्ष की तपिश से तपकर निकला शिक्षा का सूरज:
जीवन ने कई मोड़ दिए — छोटे-मोटे व्यवसाय किए, कठिन दौरों से गुज़रे, लेकिन अंततः दिल ने शिक्षा के क्षेत्र को ही अपना धर्म मान लिया। 1999 में 'ऑक्सफोर्ड पब्लिक स्कूल' की स्थापना मात्र पाँच कमरों से हुई, पर आज वह एक शृंखला बन चुकी है, जिसमें पाँच विद्यालय शामिल हैं।
यह केवल संस्थानों का विस्तार नहीं, बल्कि हज़ारों बच्चों के भविष्य को रोशन करने का मिशन बन चुका है। साधनों की कमी, आर्थिक अस्थिरता, पारिवारिक जिम्मेदारियाँ — किसी ने भी उनके संकल्प को डिगाया नहीं।
कविता के रूप में एक पुत्र का प्रण:
ऋतुराज की कविता उनके पिताजी के संपूर्ण जीवन-संग्राम का काव्यात्मक दस्तावेज बन गई है। उन्होंने लिखा:
“आप जैसे लोग सदी में एक बार आते हैं,
संघर्षों में भी मुस्कराते हैं,
दूसरों के लिए जीते हैं,
हर जीवन को उजाले से सींचते हैं।”
कविता में माँ कुसुम जी के साथ के प्रति कृतज्ञता, स्व. बिनोद जैसे भाई की क्षति का शोक, तथा बच्चों आलोक और सुजाता की परवरिश में उनके निःस्वार्थ योगदान का भी उल्लेख है।
ऋतुराज ने यह भी संकल्प लिया कि पिता द्वारा दिखाए गए मार्ग को आगे बढ़ाएंगे और "पिता की तपस्या को व्यर्थ नहीं जाने देंगे।"
एक प्रकाशपुंज, जो अंधेरे में भी उजाले की दिशा दिखाता रहा:
आज मनोज सिन्हा न केवल एक शिक्षण संस्थान के संस्थापक हैं, बल्कि वे एक संघर्षशील मार्गदर्शक, कर्मशील समाजसेवी, और परिवार के प्रेरक पुरुषार्थी के रूप में पहचाने जाते हैं।
उनका जीवन यह सिखाता है कि—
"संसाधनों की कमी हो सकती है,
पर संकल्प में कभी कमी नहीं होनी चाहिए।"
उनके जीवन-संघर्ष और सेवा का यह पथ युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुका है।

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