भीषण पेयजल संकट से जूझ रहा मौरा गांव, रेत में गड्ढा खोदकर पानी निकालने को मजबूर ग्रामीण
गिद्धौर/जमुई : गिद्धौर प्रखंड के मौरा गांव में हर साल गर्मी के मौसम में पेयजल संकट गंभीर रूप ले लेता है। करीब 15 हजार की आबादी वाला यह गांव आज भी पानी जैसी बुनियादी सुविधा के लिए संघर्ष कर रहा है। हालात इतने खराब हैं कि ग्रामीणों को सूखी नदी की रेत में गड्ढा खोदकर पानी निकालना पड़ रहा है।
गांव में चापाकल, बोरिंग और नल-जल योजना जैसी सरकारी व्यवस्थाएं तो मौजूद हैं, लेकिन गर्मी शुरू होते ही सभी जल स्रोत सूख जाते हैं। ऐसे में गांव से कुछ दूरी पर स्थित नदी ही लोगों के लिए एकमात्र सहारा बन जाती है।
हर दिन सुबह-शाम बच्चे, महिलाएं, बुजुर्ग और युवा नदी किनारे पहुंचते हैं और घंटों मेहनत कर रेत में गड्ढा खोदते हैं, तब कहीं जाकर थोड़ी मात्रा में पानी मिल पाता है। ग्रामीण महिला सरिता देवी बताती हैं कि पीने तक का पानी उपलब्ध नहीं है, मजबूरी में इसी गंदे पानी से पीना, खाना बनाना, नहाना और कपड़े धोना पड़ता है।
जैसे-जैसे गर्मी बढ़ती है, पानी का स्तर और नीचे चला जाता है। कई बार 5 से 6 फीट गहरा गड्ढा खोदने के बाद ही पानी मिल पाता है। गांव के बुजुर्ग उदित मिश्रा के अनुसार, यह समस्या नई नहीं है, बल्कि वर्षों से ग्रामीण इसी तरह पानी के लिए जूझते आ रहे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि चुनाव के समय जनप्रतिनिधि आश्वासन तो देते हैं, लेकिन आज तक इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सका। पीएचईडी विभाग द्वारा 610 से 620 फीट गहरी बोरिंग कर नल-जल योजना शुरू करने की कोशिश भी असफल रही।
ग्रामीणों का आरोप है कि नदियों से बड़े पैमाने पर हो रहे बालू उठाव के कारण जलस्तर लगातार नीचे जा रहा है। पहले जहां कम गहराई में पानी मिल जाता था, अब गहरे बोरिंग के बाद भी पानी नहीं मिल रहा है।
ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते जल संकट का समाधान नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में स्थिति और भी भयावह हो सकती है। फिलहाल मौरा गांव के लोगों के लिए नदी की रेत में खोदा गया छोटा सा गड्ढा ही जीवन का सहारा बना हुआ है।

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