यूजीसी के ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी रेगुलेशंस 2026’ पर विवाद, अभिषेक गोयल ने जताई आपत्ति - City Channel

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Sunday, January 25, 2026

यूजीसी के ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी रेगुलेशंस 2026’ पर विवाद, अभिषेक गोयल ने जताई आपत्ति

यूजीसी के ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी रेगुलेशंस 2026’ पर विवाद, अभिषेक गोयल ने जताई आपत्ति


सिटी ब्यूरो रिपोर्ट, राजीव शर्मा/मनोज कुमार

खतौली, मुजफ्फरनगर : विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा लागू किए गए ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी रेगुलेशंस 2026’ को लेकर देशभर में चर्चा का माहौल है। इसी क्रम में अखिल भारतीय वैश्य महासंगठन, खतौली के नगर अध्यक्ष अभिषेक गोयल ने रविवार को एक प्रेस बयान जारी कर नए नियमों पर गंभीर आपत्ति जताई है।

अभिषेक गोयल ने आरोप लगाया कि यह अधिनियम सामान्य वर्ग के छात्रों के लिए असुरक्षा और मानसिक उत्पीड़न की स्थिति पैदा कर सकता है। उनका कहना है कि समानता के उद्देश्य से लाया गया यह कानून व्यवहार में असंतुलन उत्पन्न कर सकता है, जिससे शैक्षणिक संस्थानों में सामाजिक समरसता प्रभावित होने की आशंका है।

उन्होंने कहा कि नए नियमों के तहत जातिगत भेदभाव की परिभाषा अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग तक सीमित रखी गई है। उनके अनुसार, यदि किसी सामान्य वर्ग के छात्र के साथ उसकी जाति के आधार पर भेदभाव होता है, तो वह इन नियमों के अंतर्गत शिकायत दर्ज नहीं कर पाएगा।

गोयल ने यह भी कहा कि ड्राफ्ट नियमों में झूठी शिकायतों पर जुर्माने का प्रावधान था, जिसे अंतिम अधिसूचना में हटा दिया गया है। इससे नियमों के दुरुपयोग की संभावना बढ़ सकती है। उन्होंने आशंका जताई कि केवल आरोप के आधार पर प्राथमिकी दर्ज होने की स्थिति में मेधावी छात्रों का भविष्य प्रभावित हो सकता है।

जांच समितियों की संरचना पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि यदि समिति में विविध सामाजिक प्रतिनिधित्व न हो, तो निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लग सकता है। इससे छात्रों में हीन भावना और सामाजिक असंतोष पनपने का खतरा है।

अभिषेक गोयल ने केंद्र सरकार से आग्रह किया है कि यूजीसी द्वारा लाए गए इन नियमों की पुनर्समीक्षा की जाए या आवश्यक संशोधन किए जाएं, ताकि शिक्षा के क्षेत्र में समानता, न्याय और सामाजिक सद्भाव कायम रह सके।

उल्लेखनीय है कि यूजीसी का यह अधिनियम 15 जनवरी 2026 से देशभर के विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों में लागू किया गया है। इस पर विभिन्न संगठनों और शिक्षाविदों की प्रतिक्रियाएं लगातार सामने आ रही हैं।

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