किसानों के आंदोलन के सामने झुका प्रशासन, रात में दौड़े-दौड़े पहुँचे अंचलाधिकारी
सिटी ब्यूरो रिपोर्ट : राजीव रंजन/राकेश कुमार
जमुई : राजस्व महाअभियान शिविर में व्याप्त अनियमितताओं और किसानों की लगातार हो रही उपेक्षा के खिलाफ किसानों का गुस्सा आखिरकार प्रशासन पर भारी पड़ा। खैरा प्रखंड के खडाईच पंचायत सरकार भवन के समक्ष भाकपा (माले) के नेतृत्व में किसानों का अनिश्चितकालीन धरना चौथे दिन मंगलवार की रात प्रशासन को झुकने पर मजबूर कर गया।
सरकार की ओर से चलाए जा रहे विशेष राजस्व महाअभियान शिविर का उद्देश्य ऑनलाइन जमाबंदी लगाना, दाखिल-खारिज और परिमार्जन से जुड़ी समस्याओं का समाधान करना था। लेकिन हकीकत यह रही कि इन शिविरों में किसानों की समस्याओं को दूर करने के बजाय राजस्व विभाग के कर्मचारियों और बिचौलियों की मिलीभगत से जमाबंदी व दाखिल-खारिज के नाम पर आर्थिक दोहन किया जा रहा था। इससे आक्रोशित होकर किसान 15 सितम्बर से धरना पर बैठ गए।
धरना का नेतृत्व भाकपा (माले) जिला सचिव शम्भू शरण सिंह, युवा नेता बाबू साहब सिंह और खेत-मजदूर नेता बासुदेव राय ने किया। उनका कहना था कि किसान अब शोषण और भ्रष्टाचार को बर्दाश्त नहीं करेंगे। उन्होंने चार सूत्री मांगपत्र तैयार कर अंचलाधिकारी को सौंपने का प्रयास किया, लेकिन अंचलाधिकारी विश्वजीत कुमार पहले तो धरना स्थल पर नहीं पहुँचे और न ही किसानों से वार्ता की।
अंचलाधिकारी की इस उपेक्षा से गुस्साए किसानों ने उनका पुतला दहन करने की घोषणा कर दी। आंदोलन तेज होता देख प्रशासन हरकत में आया और आनन-फानन में देर रात स्वयं खैरा अंचलाधिकारी धरना स्थल पर पहुँचे। पहुँचते ही उन्होंने किसानों से लेट से आने के लिए माफी मांगी और उनकी चार सूत्री मांगपत्र को ग्रहण किया। साथ ही यह भरोसा दिलाया कि किसानों से लिये जा रहे जमीन से जुड़े दस्तावेजों की त्वरित जांच कर सभी समस्याओं का निवारण किया जाएगा।
अंचलाधिकारी का रुख नरम पड़ते ही किसानों ने अनिश्चितकालीन धरना को समाप्त करने की घोषणा की। मौके पर मौजूद नेताओं और किसानों ने कहा कि अगर आश्वासन के बावजूद मांगें पूरी नहीं होती हैं, तो आंदोलन और भी बड़े रूप में किया जाएगा।
धरना स्थल पर बड़ी संख्या में किसान मौजूद थे, जिनमें कृष्ण कुमार मालाकार, बेनी साह, विजय साह, टिंकू साह, तुलसी मंडल, राजो गोस्वामी, शिवेंद्र यादव, बिंदु कुमार समेत सैकड़ों किसान शामिल रहे।
किसानों ने ऐलान किया कि यह जीत उनकी एकजुटता और संघर्ष का परिणाम है और भविष्य में भी यदि किसानों की आवाज दबाने की कोशिश की गई तो वे सड़क से सदन तक आंदोलन करने को तैयार रहेंगे।

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