माता सीता एकम ना द्वितीय - रूपेश कुमार
माता सीता एक है इनका स्वरूप एक किसी और स्वरूप में नहीं मिलेंगी। वही श्री राम कई रूप में आपको मिलेंगे श्री राम, वामन, मत्स्य, नरसिम्हा, परशुराम, कच्छप, कृष्ण बुद्ध कल्की रूप में आपको मिल जाएंगे या प्राप्त हो जायेंगे लेकिन माता सीता एक ही है। स्वंय बाल्मिकी जी ने कहा है कि मेरे रामायण में अगर कोई चरित्र प्रधान है तो वह सीता जी है।
वहीं तुलसीदास जी सीता जी के महत्व को मंगलाचरण में किया है। माता सीता सर्बश्रेयस्करी है, कल्याणकारी है, माता सीता जगदंबा है, संसार को पैदा करने वाली है, प्रकट करने वाली है, पालन करने वाली है। पालन करते करते जो वस्तु अनावश्यक रूप से जुड़ जाती है उसका संहार करने वाली है क्लेश हारनी है माता सीता।
वही सर्वकल्याण कारी है माता सीता जो श्री राम की अत्यंत प्रिय है। मां जन्म देती है, पालन करती है, खेलते खेलते बच्चे के शरीर पर गंदगी लग जाती है उस्को मिटाने वाली मां ही होती है। सीता माता में वे तीनों लक्षण विद्दमान है। सीता जी अदभुत शक्ति है परमात्मा की, वह क्लेश हारनी है, हम सब के जीवन में क्लेश बहुत है, सांसारिक रूप में क्लेश कष्ट है, क्लेश के पांच प्रकार है : राग , द्वेष , अविद्या , जिजीविषा और अस्मिता।
वैसे अस्मिता प्यारा शब्द है, अस्मिता का अर्थ गौरव होता है, लेकिन गौरव कब अंहकार में बदल जाए कहना मुस्किल है। इसलिए यह क्लेश है रामचरितमानस में जो प्रधान पात्र हैं, उनका श्रेय (कल्याण) प्रत्यक्ष परोक्ष रूप से माता सीता ही है। सर्वप्रथम सुग्रीव का कल्याण माता सीता ही ने किया। सुग्रीव को देखकर रावण द्वारा अपहृत माता सीता अपने वस्त्र और अलंकार सुग्रीव पर फेंकती हैं यह उनके कल्याण का श्री गणेश है। रावण का कल्याण भी माता सीता के द्वारा ही हुआ।
अंगद का कल्याण भी माता-सीता के द्वारा ही हुआ। हनुमान जी पर तो माता-सीता की कृपा बरस पड़ी हनुमान जी को उन्होंने कहा की राम का सबसे ज्यादा प्रेम तुम्हें मिलेगा तुम राम के सबसे प्रिय रहोगे औरों का कल्याण तो किया ही किया राम जी को भी श्रेय उन्होंने ही दिया। सती ने सीता का रूप लिया तो आध्यात्मिक लाभ हो गया। खोखली बौद्धिकता समाप्त हो गई और श्रद्धा प्रकट हो गई।
शरणागत श्रद्धा का जन्म हुआ यह तो श्रेय यानी कल्याण ही हुआ। सीता जी कहती हैं कि मैं मां पार्वती की जब प्रार्थना की तो उन्होंने मुझे एक फूल की माला दी लेकिन मैं सुग्रीव को मेरे महत्व के वस्त्र और अलंकार प्रसन्नता से डालती हूं। रावण सीता का भक्त बना इसलिए उसका भी कल्याण हुआ। कुंभकरण का श्रेय भी सीता जी ने ही किया कुंभकरन सीता जी का ही स्मरण किया था। स्मरण मात्र से सीता जी ने ऐसे कुंभकरण का कल्याण कर दिया की पता ही ना लगे यहां तक की राम का श्रेय भी सीता जी ने ही किया।
जब रावण नहीं मरता है तो श्री राम दुर्गा की पूजा करते हैं यानी शक्ति की पूजा करते हैं और शक्ति कौन है माता सीता है परम शक्ति हीं श्री राम को जीत दिलाई। सर्व का श्रेय करने वाली माता सीता को मैं बार-बार प्रणाम करता हूं नमन करता हूं उनका शरणागत हूं।

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